दहाड़

एक चमचमाते जंगल में, जहाँ सूरज की किरणें घास पर नाचती थीं और पेड़ हवा में झूमते थे, वहाँ रहता था एक नन्हा शेर का बच्चा, जिसका नाम था सिंबा। वह एक पीले फर का गोल-मटोल गोला था, जिसकी आँखें चमकदार थीं, जैसे दो छोटे-छोटे सितारे। लेकिन आज, सिंबा का चेहरा लटका हुआ था, जैसे कोई बादल उसकी मुस्कान चुरा ले गया हो। उसकी पूँछ ज़मीन पर घिसट रही थी, और वह खुद को एक छोटे से चींटी जितना बेकार महसूस कर रहा था।

सब कुछ उस सुबह शुरू हुआ, जब सिंबा जंगल में टहलने निकला। अचानक, ज़ूम! एक चीता, जिसका नाम था रफ्तार, बिजली की तरह उसके पास से दौड़ा। सिंबा के बाल पीछे उड़ गए, और वह अपने ही पंजों पर लुढ़क गया। “अरे बाप रे!” सिंबा चिल्लाया, अपनी पूँछ को पकड़ते हुए। “ये तो हवा से भी तेज़ दौड़ता है! मैं तो अपनी पूँछ का पीछा करते-करते चक्कर खा जाता हूँ!”

थोड़ा आगे बढ़ा, तो उसने देखा एक विशाल हाथी, जिसका नाम था बलवान। बलवान ने अपनी सूंड से एक मोटा लट्ठा उठाया, जैसे वह कोई पंख हो। “ये क्या जादू है!” सिंबा ने बुदबुदाया, एक छोटे से कंकड़ को धक्का देते हुए, जो हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। “मैं तो ये कंकड़ भी नहीं हिला सकता! मैं कितना कमज़ोर हूँ!”

और फिर, उसने सिर उठाया और देखा एक जिराफ को, जिसका नाम था लंबू। उसकी गर्दन इतनी लंबी थी कि वह पेड़ों के ऊपर बादलों से बात कर रही थी। “अरे वाह!” सिंबा ने आह भरी, अपनी छोटी-सी गर्दन को छूते हुए। “वह तो चाँद पर पत्तियाँ खा सकती है! और मैं? मैं तो बस… एक नन्हा सा शेर!”

दोपहर होते-होते, सिंबा एक बड़े, टेढ़े-मेढ़े बाओबाब पेड़ के नीचे धप्प से बैठ गया। उसने पास के गड्ढे में अपनी शक्ल देखी और मुँह बनाया। “मैं बेकार हूँ!” वह बड़बड़ाया, अपनी आँखों में उदासी भरते हुए। “सब जानवर मुझसे बेहतर हैं। मैं तो कुछ भी नहीं!”

तभी, घास में से एक धीमी-धीमी खट-खट की आवाज़ आई। यह थी ज्ञानी, एक बूढ़ी कछुआ, जिसकी पीठ धूप में चमक रही थी और आँखें टिमटिमा रही थीं, जैसे वह जंगल के सारे राज़ जानती हो। वह रुकी, सिर झुकाया, और सिंबा को देखकर मुस्कुराई।

“अरे, नन्हा सिंबा!” ज्ञानी ने अपनी कर्कश मगर प्यारी आवाज़ में कहा। “ये क्या? तेरा मुँह क्यों लटका है? क्या तूने अपनी पसंदीदा हड्डी खो दी?”

सिंबा ने एक टहनी को लात मारी और फुसफुसाया, “मैं बेकार हूँ, ज्ञानी! रफ्तार तो बिजली की तरह दौड़ता है। बलवान इतना ताकतवर है कि पेड़ उखाड़ सकता है। और लंबू की गर्दन? वह तो सितारों से गप्पें मारती है! मैं तो बस… एक छोटा सा शेर, जो कुछ भी नहीं!”

ज्ञानी ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया, जो सुनकर पास का एक पक्षी डरकर उड़ गया। “बेकार? अरे, सिंबा, तू तो मज़ाक कर रहा है! जब मैं छोटी थी, मैं रोती थी क्योंकि मैं बाज की तरह उड़ नहीं सकती थी। लेकिन सुन, मेरे दोस्त!” वह पास आई, अपनी आँखें चमकाते हुए। “भगवान ने हर किसी को एक खास तोहफा दिया है। और तुझे? तुझे तो सबसे शानदार तोहफा मिला है!”

सिंबा ने सिर झटका, उसकी आँखें शक से भरी थीं। “मुझे? मेरा तोहफा क्या? मैं तो बस गिरता हूँ, लुढ़कता हूँ, और अपनी पूँछ पर बैठ जाता हूँ!”

ज्ञानी ने अपना एक पैर धीरे से ठपठपाया—जो कि पूरे तीन सेकंड ले गया। “ज़रा सब्र कर, नन्हे शेर! तू एक शेर है! तेरा तोहफा तेरे दिल में है, और तेरी दहाड़ में। अभी तुझे नहीं पता, लेकिन एक दिन तू देखेगा। जा, घर जा, अपनी दोस्त नाला के साथ दौड़, अपने भाई के साथ कुश्ती कर, और अपनी माँ को थोड़ा तंग कर। तुझे पता चलेगा कि तू कितना खास है!”

सिंबा ने एक आँख सिकोड़ी। “सचमुच? तू सोचती है मैं खास हूँ?”

“खास?” ज्ञानी ने हँसते हुए कहा। “अरे, तू इतना खास है कि सितारे रात को तुझसे जलन करते हैं! अब जा, और अगर रास्ते में गिरे, तो हँस देना। मैं पिछले हफ्ते कीचड़ में फिसल गई थी—पूरा एक घंटा लगा निकलने में!” उसने आँख मारी और एक पुराना गाना गुनगुनाते हुए धीरे-धीरे चली गई।

सिंबा ने उसे जाते देखा, उसका मुँह अब थोड़ा कम लटका था। “शायद ज्ञानी सही है,” वह बुदबुदाया, अपने पंजों पर उछलते हुए। “या शायद वह थोड़ी पागल है। लेकिन मुझे अपने भाई को एक ज़ोरदार धक्का देना है!”

दिन बीत गए, और सिंबा ने जंगल में खूब मस्ती की। वह अपनी दोस्त नाला के साथ घास में दौड़ा, और जब नाला ने उसे धक्का देकर लुढ़का दिया, तो वह हँसते हुए चिल्लाया, “अरे, ये तो गुदगुदी वाला हमला था!” उसने अपने भाई, मुफासा जूनियर, के साथ कुश्ती की। मुफासा ने मज़ाक किया, “सिंबा, तू तो गीली बिल्ली की तरह लड़ता है!” सिंबा ने जवाब दिया, “हाँ, लेकिन ये बिल्ली तुम्हें ज़रूर हराएगी!” वह अपनी माँ को डराने की कोशिश भी करता, लेकिन माँ उसे गुदगुदा देती और कहती, “मेरे छोटे राजा, थोड़ा और ज़ोर लगाओ!”

सिंबा का दिल अब हल्का था, और उसकी उदासी कहीं गायब हो गई थी। वह हर दिन हँसता, खेलता, और जंगल में उछल-कूद करता। लेकिन उसे अभी तक नहीं पता था कि उसका असली तोहफा क्या है।

एक धूप भरी दोपहर, सिंबा और नाला चट्टानों के पास लुका-छिपी खेल रहे थे। सिंबा एक बड़े पत्थर के पीछे छिपा और सोचा, “अब मैं नाला को डराऊँगा!” उसने अपनी छाती फुलाई, गहरी साँस ली, और फिर… दहाड़! एक ज़ोरदार, गूँजती, आसमान हिलाने वाली दहाड़! वह इतनी ज़ोरदार थी कि पास की चट्टानें काँप गईं, और जंगल में सन्नाटा छा गया।

नाला अपने छिपने की जगह से उछलकर बाहर आई। “अरे माँ!” वह चिल्लाई, अपनी पूँछ पकड़ते हुए। पास के पेड़ से सारे पक्षी उड़ गए, जैसे कोई तूफान आ गया हो। यहाँ तक कि दूर खड़े कुछ लकड़बग्घे भी डरकर भागे, चिल्लाते हुए, “ये क्या था?! हम तो गए!”

सिंबा का मुँह खुला रह गया। “क्या… क्या मैंने ये किया?” उसने हैरानी से पूछा, अपनी आँखें गोल-गोल करते हुए।

नाला उछलती हुई आई, उसकी आँखें चमक रही थीं। “सिंबा, ये तो कमाल था! तूने उन लकड़बग्घों को डरा दिया! वे शायद अब तक चाँद पर पहुँच गए होंगे!” वह हँसते हुए बोली। “तू तो जंगल का सुपरस्टार है!”

सिंबा ने अपनी छाती फुलाई, उसका चेहरा एक बड़ी, चमकदार मुस्कान से भर गया। “मैं खास हूँ!” वह चिल्लाया, और फिर रुककर ज्ञानी की बात याद की। उसने सूरज की ओर देखा, जो गुलाबी और नारंगी रंगों में डूब रहा था। “ज्ञानी सही थी! मेरी अपनी दहाड़ है, और ये सुपर ज़ोरदार है!”

उस दिन के बाद, सिंबा जंगल में ज़्यादा गर्व से चला। उसकी दहाड़ ज़्यादा ज़ोरदार हो गई, और उसकी मुस्कान ज़्यादा चमकदार। वह कभी नहीं भूला कि वह कितना खास है। नाला और मुफासा जूनियर अब उससे कहते, “सिंबा, ज़रा धीरे दहाड़, वरना हमारी पूँछें उड़ जाएँगी!” और वह हँसकर जवाब देता, “कोई बात नहीं, ये तो मेरा सुपरपावर है!”

कहीं दूर, एक छायादार पेड़ के नीचे, ज्ञानी कछुआ अपनी धीमी चाल से चल रही थी। उसने सिर हिलाया और मुस्कुराई। “कहा था ना, नन्हे शेर,” वह बुदबुदाई। “तू जंगल का असली हीरो है!”

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